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Thursday, Dec 7, 2023
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आर्य समाज मंदिर में शादी को ‘सुप्रीम मान्यता’!

ग्वालियर(देसराग)। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद अब फिर से आर्य समाज मंदिर में होने वाली शादियों को वैधानिक मान्यता मिल गई है। इस फैसले के बाद आर्य समाज में खुशी की लहर है। समाज के आचार्यों का कहना है कि यहां होने वाले विवाह हिंदू मैरिज एक्ट के तहत और हिंदू रीति-रिवाज से ही होते हैं। वैदिक परंपराओं के मुताबिक अग्नि को साक्षी मानकर ही विवाह संपन्न होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि आर्य समाज मंदिरों में शादी करने को लेकर लोगों को लंबी कानूनी प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ता। उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खण्डपीठ ने आर्य समाज मंदिरों में होने वाली शादियों पर रोक लगा दी थी। जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुनाया है।
सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के इस आदेश पर स्टे (अंतरिम रोक) लगा दी है। जिसके बाद एक बार फिर से आर्य समाज के मंदिरों में शादी करने का रास्ता साफ हो गया। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले का आर्य समाज ने स्वागत किया है। आर्य समाज से आचार्यों का कहना है कि हम वेद को मानने वाले लोग हैं। यहां के मंदिरों में वैदिक मान्यता के अनुसार ही दोनों पक्षों की सहमति से ही विवाह समपन्न कराए जाते हैं। हालांकि जो भ्रम था वह कुछ लोगों की वजह से आया था, जो आर्य समाज के नाम पर दुकानदारी चला रहे हैं, लेकिन इसका लांछन आर्य समाज पर नहीं लगाया जाना चाहिए।
1937 में पारित हुआ था आर्य समाज एक्ट
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद आर्य समाज मंदिरों के आचार्यों और पुजारियों का कहना है कि 1937 में आर्य समाज एक्ट पारित हुआ। बाद में 1955 में हिन्दू विवाह एक्ट बना। इसमें मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खण्डपीठ ने कुछ नियमों को जोड़ दिया था। इसमे कहा गया था कि माता पिता की उपस्थिति और सहमति का आवेदन भी होना चाहिए। आर्य समाज का विवाह एक्ट अलग है। जिसमें शादी करने जा रहे महिला और पुरुष की सहमति ही जरूरी होती है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद आर्य समाज के आचार्य धीरेंद्र पांडे कहते हैं कि अब फिर से 1937 में बने आर्य समाज के संविधान के अनुरूप विवाह हो सकते हैं। पांडे कहते हैं कि आर्य समाज गैर पारिवारिक विवाह नहीं करवाता। आर्य समाज मे जब भी विवाह होता है उस दौरान सभी नियमों का पालन किया जाता है। यहां विवाह के दौरान वर-वधू के माता-पिता सहित रिश्तेदार भी शामिल होते हैं। अग्नि के समक्ष विवाह होता है। विवाह पूरी तरह से हिन्दू रीति रिवाज से संपन्न होता है। जिसका प्रमाणपत्र भी दिया जाता है।
यह है पूरा मामला
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खण्डपीठ ने आर्य समाज की संस्थाओं में होने वाली शादियों पर सवाल उठाया था। उच्च न्यायालय ने माना था कि शादियों के लिए कुछ आर्य समाज की संस्थाएं दुकानों के रूप में काम कर रही हैं। न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि आर्य समाज में होने वाली शादियों में न्यायालय द्वारा दिए गए कई निर्देशों का पालन नहीं किया जाता है। इसकी वजह से पूरे समाज में दूषित वातावरण पैदा हो रहा है। साथ ही उच्च न्यायालय ने ये भी कहा था कि आर्य समाज में होने वाली शादियों के सर्टिफिकेट जारी करने का अधिकार सभी को नहीं है। इसे लेकर आर्य समाज ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी।
कैसे सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा मामला
ग्वालियर की पवनसुत कॉलोनी स्थित पंडित मूल शंकर आर्य समाज वैदिक संस्था द्वारा पिछले दिनों जारी किए गए वैवाहिक प्रमाण पत्र को लेकर उच्च न्यायालय की ग्वालियर खण्डपीठ ने कड़ी आपत्ति जाहिर की थी। उच्च न्यायालय ने कहा था कि इस तरह की संस्थाएं विवाह जैसे संवेदनशील मामले में सावधानी नहीं बरत रही हैं। न्यायालय ने वर-वधु पक्ष के लोगों को जानकारी नहीं देना और उन्हें नोटिस जारी नहीं करना भी लापरवाही बताया था। इसे लेकर उच्च न्यायालय की ग्वालियर खण्डपीठ ने आर्य समाज मंदिर में होने वाली शादियों पर रोक लगा दी थी और उन्हें मैरिज सर्टिफिकेट जारी करने से रोक दिया था। इसके खिलाफ आर्य समाज की प्रांतीय इकाई मध्य भारतीय आर्य समाज प्रतिनिधि सभा के पदाधिकारी प्रकाश आर्य ने सर्वोच्च न्यायालय में उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी थी। सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के बाद ग्वालियर उच्च न्यायालय के फैसले पर स्थगन आदेश जारी किया है। हालांकि इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम फैसला अभी नहीं आया है, लेकिन उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाने से आर्य समाज संस्था को बड़ी राहत मिली है।
वर वधु का बालिग होना आवश्यक
भोपाल में आर्य समाज मंदिर के आचार्य जयवीर शास्त्री का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्टे देकर आर्य समाज की शादियों की मान्यता को बरकरार रखा है। हमारे यहां वर-वधू बालिग होना चाहिए। शादी करने वाले दोनों लोगों का हिंदू होना भी जरूरी नहीं है। हालांकि कोई एक पक्ष हिन्दू जरूर होना चाहिए। हमारे यहां इंटर कास्ट मैरिज भी होती है। उनका कहना है कि हमने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ डबल बेंच में पिटीशन दायर की थी, जिसपर फैसला हमारे पक्ष में आया था।
पुराना है आर्य समाज का संविधान
आचार्य जयवीर शास्त्री से जब पूछा गया कि आप लोग स्पेशल मैरिज एक्ट क्यों नहीं चाहते, इस पर जयवीर शास्त्री ने कहा कि आर्य समाज की स्थापना स्वामी दयानंद सरस्वती ने की थी। एक सदी से ज्यादा समय से शादियां कराई जा रही हैं। जब हिंदू पर्सनल लॉ अस्तित्व में भी नहीं था। उनका कहना है कि स्पेशल मैरिज एक्ट एक प्रकार से सीधा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और इसी बात को लेकर हम सर्वोच्च न्यायालय गए थे।
सर्वोच्च न्यायालय में रखीं दलीलें
उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ मध्य भारत आर्य प्रतिनिधि सभा नाम की संस्था सर्वोच्च न्यायालय पहुंची थी। संस्था की तरफ से वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने दलीलें रखीं। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय का आदेश सीधे-सीधे विधायिका के अधिकार क्षेत्र में दखल है। कानून बनाना विधायिका का काम है। आर्य समाज की शादियों में हिंदू मैरिज एक्ट लागू होता है। जब दूल्हा और दुल्हन अलग अलग धार्मिक समुदाय से हों, तभी स्पेशल मैरिज एक्ट लागू करने की ज़रूरत होनी चाहिए, लेकिन उच्च न्यायालय ने 2 हिंदू वयस्कों की शादी में भी इसे लागू करने का आदेश दिया है, जबकि आर्य समाज के मंदिरों में होने वाली शादियों में हिंदू मैरिज एक्ट के प्रावधान लागू होते हैं। वकील की दलीलों को सुनने के बाद जस्टिस केएम जोसफ और ऋषिकेश रॉय की बेंच ने मामले में नोटिस जारी कर दिया। जजों ने उच्च न्यायालय के आदेश पर भी रोक लगा दी। न्यायालय के आदेश के बाद आर्य समाज मंदिर में होने वाली शादियों में फिलहाल हिंदू मैरिज एक्ट के प्रावधान लागू होते रहेंगे। न्यायालय विस्तृत सुनवाई के बाद तय करेगा कि हाई कोर्ट का आदेश सही था या नहीं। मामले में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का असर पूरे देश में होने वाली आर्य समाज शादियों पर पड़ सकता है।
पुरानी कुरीतियां खत्म करना उद्देश्य
आर्य समाज के सदस्य उमेश सोनी का कहना है कि आर्य समाज की कोई अलग से पद्धति नहीं है। आर्य समाज का इतिहास 200 साल पुराना है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसकी स्थापना ही सामाजिक कुरीतियों को खत्म किए जाने के उद्देश्य से की थी। सोनी कहते हैं कि हालांकि कुछ लोग ऐसे जरूर सामने आए हैं, जोकि आर्य समाज के नाम पर शादियां करवा रहे हैं। लेकिन पूरे आर्य समाज पर इसका लांछन नहीं लगाया जाना चाहिए।

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