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Tuesday, Jun 6, 2023
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विचार

अंधेरों के तिलिस्म को तोड़िये:यह जागने का वक्त है

नज़रिया

सोमेश्वर सिंह
वर्षों से मॉर्निंग वॉक में जाता हूं। वाकिंग ट्रैक फिक्स है। समय आगे पीछे हो जाता है। मेरी आदत है वॉकिंग में किसी से बोलता नहीं। दाएं बाएं देखता नहीं। सामने या नीचे नजर करके अपनी धुन में चला जाता हूं। सामने से आता कोई परिचित मिल गया तो सिर्फ हाथ उठाकर विश ही कर पाता हूं। कुछ मित्र भी समूह में वाकिंग करते हैं ।मुझे भी बुलाया, मैंने मना कर दिया। वजह पूछी तो बता दिया कि मैं सेहत के लिए जाता हूं और तुम लोग मनोरंजन करने। मैंने देखा है कि जो लोग समूह में वाकिंग करने जाते हैं। परस्पर बातचीत करते हैं। कभी-कभी खड़े होकर डिस्कशन शुरू कर देते हैं। उनके डिस्कशन की विषय वस्तु भी अजीबोगरीब होती है।

मान लीजिए मॉर्निंग वॉक करते हुए आसपास से कोई अपरिचित महिला गुजर गई। वह ठिगनी है कि लंबी, मोटी है कि स्लिम, उसकी चाल हिरनी जैसी है की गज गामिनी इसी विषय पर गुफ्तगू करने लगेंगे। किसी को उसकी आंखें अच्छी लग जाएगी, तो किसी को सुडौल वक्ष,तो कोई नितंब की तारीफ करेगा तो फिर कोई कमर की। सभी यह भूल जाते हैं की सेहत बनाने के लिए मॉर्निंग वॉक में आए हैं। उनकी बेफिजूल की बातें सुनकर ऐसा लगता है कि जैसे किसी सिनेमाघर से कोई रोमांटिक फिल्म देखकर लौटे हों। इत्तेफाक से यदि वह महिला परिचित हुई और उसने इस समूह को देखकर विश नहीं किया, थोड़ी सी स्माइल नहीं दी तो फिर लग जाएंगे उसके परिवार का नुक्स निकालने।

इस सृष्टि में महिलाएं कहीं सुरक्षित नहीं है। न इस लोक में न उस लोक में। सनातन काल से महिलाओं को सिर्फ भोग की वस्तु बना दिया गया है। यौन सुख के लिए क्या देव क्या दानव। ऋषि, मुनि, संत,महात्मा ने अपने योग तप और शक्ति का दुरुपयोग किया है। सुख ,वैभव, भोग विलास, वंश वृद्धि के लिए स्त्री के साथ ना जाने कितने छल प्रपंच किए गए। अंधविश्वास तथा अंधभक्ति ने स्त्री को और भी पराधीन बना दिया है। विधवा महिला के लिए खानपान, रहन सहन, परिधान की अनेक वर्जनाये हैं। परंतु विधुर पुरुष स्वच्छंद है। सिंदूर, बिंदी, काजल, चूड़ियां सिर्फ महिलाओं के लिए बेड़िया बना दी गई।

जन्म काल से ही लड़कियों के मन में घर, परिवार, समाज असुरक्षा की भावना पैदा कर देता है। लोक लाज, सामाजिक मर्यादाओं के नाम पर स्त्री को बंधक बना दिया गया। स्वच्छ भारत अभियान की सही तस्वीर देखना हो तो आप सुबह मॉर्निंग वॉक में जरूर निकलिए। शहरी आबादी बढ़ रही है, खुले मैदान सिमट रहे हैं। अंधेरे मुंह लड़कियां, महिलाएं शौच के लिए जाती है। महफूज जगह खोजती हैं। महिलाएं समूह में शौच करने जाती हैं। क्योंकि यहां भी वह अकेले असुरक्षित हैं। सूर्योदय के पहले और सूर्यास्त के बाद ही महिलाएं निवृत हो पाती हैं। बेशर्म पुरुष तो दिन के उजाले में भी कहीं भी मूतने, हगने लगता है।

एक दिन मैं मॉर्निंग वॉक से वापस लौट रहा था। पहली बार नजरें जमीन से ऊपर करके देखा की पूरब में लालिमा है। उषाकाल का वक्त था। सूर्य देवता उदय हो रहे थे। आसमान में छुटपुट बादल थे। बादलों की ओट से लालिमा झांक रही थी। लालिमा के ऊपर बादल मंडरा रहे थे। अद्भुत दृश्य था। अनेक प्रतिबिंब बन बिगड़ रहे थे। एक जगह स्थिर होकर सूर्योदय के उस दृश्य को देखने लगा। शरीर में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचरण होने लगा। स्फूर्ति आ गई। घर पहुंच कर अपराध बोध से ग्रस्त हो गया। जीवन में पहली बार सूर्योदय का दृश्य देखा था। मुझे बचपन याद आ गया। कि आखिर क्यों बड़े बूढ़े स्नान के बाद सूर्य को जल चढ़ाते थे ।आराधना करते थे। अधिकांश महिलाएं आज भी सुबह स्नान के बाद सूर्य देव की आराधना करती हैं जल चढ़ाती हैं।
सूर्य जीवन, शक्ति, ऊर्जा ,गति का केंद्र है। सूर्योदय के साथ ही दिनचर्या की शुरुआत होती है। पखेरू भी बसेरा छोड़ देते हैं। अविवाहित कुंती ने सूर्य का आह्वान कर के कर्ण जैसे महादानी शूरवीर को जन्म दिया। जब तक सूर्य उत्तरायण नहीं हुए तो भीष्म पितामह ने प्राण नहीं त्यागा। अभिमन्यु के वीरगति प्राप्त करने के बाद धनुर्धर अर्जुन ने संकल्प लिया था। कि यदि सूर्यास्त के पहले उन्होंने जयद्रथ का वध नहीं किया तो चिता में भस्म हो जाएगे। मूर्छित लक्ष्मण का भी जीवनदान सूर्य के उदय और अस्त पर आश्रित था। दुर्भाग्य है कि हम जीवन भर सूर्यास्त देखते हैं। उदय ने हमें कभी आकर्षित किया ही नहीं। अस्त जीवन का अंत है और उदय प्रारंभ। अस्त अर्थात मृत्यु के पीछे हम भाग रहे हैं, फिर भी उससे डर रहे हैं। उदय तो हमने देखा ही नहीं। देखा भी तो अनदेखा कर दिया। सूर्योदय काल की शक्ति को यदि आत्मसात किया होता तो जीवन भर खुद की लाश कंधे में लेकर ना ढो रहे होते।

जागो, यह जागने का वक्त वक्त है। विंध्य पर्वत शिखर माला कैमोर की तराई में आज एशिया का सबसे बड़ा सौर ऊर्जा केंद्र स्थापित है। धरती हमारी, आसमान हमारा, सूर्य प्रकाश हमारे हिस्से का, मेहनत हमारी, फिर भी उत्पादित ऊर्जा की बिजली हम दिल्ली भेज रहे हैं। जिसका उपयोग सरमायेदार कर रहे हैं। फिर भी हमारे घरों में अंधेरा है। अंधेरों के इस तिलस्म को समझिए और इसे तोड़िए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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